Tuesday, May 3, 2016

तमाशा


पेड़ से मिली छाया 
फल भी 
फूल भी 
उसके डाल ने हिलाया
झुलाया 
सुलाया
अनगिनत रूप दिए 
मन से निहारता रहा 
अनगिनत गंध दिए 
नस में उतारता रहा 
छोटे-मोटे 
रचे-बसे 
देख कई घोसलों से 
सपने मिले 
उदकती फुदकती 
चहकती दुबकती 
रंग विरंगे अंग संग 
अपने मिले 
हर अकेले लम्हों में 
पेड़ का रहा अतुल साथ 
उसके तनों से लिपट 
माँ - सी मिला बहुल हाथ 
याद कर उसे 
और कुछ लिख कर 
प्यासे जीभ पर बसा 
कविता रूपी ओस हूँ 
मैं और कुछ नहीं 
एहसानफरामोश हूँ !!!

Monday, March 7, 2016

लेकिन











ऐसा कर देने से
ज़्यादा सरल है
ऐसा कह देना
ऐसा कह देने से
ज़्यादा सरल है
ऐसा सोच लेना
लेकिन ये कतई सरल नहीं
इस सोच के आने की
सही वजह समझ लेना.

Friday, December 2, 2011

राजा-रानी



(लघुकथाएँ)
1.
एक राजा की तीन रानियाँ। एक थी, एक है और एक होनेवाली है। तीनों रानी हैं एक दूसरे से दूर, एक दूसरे से अपरिचित।
2.
एक राजा की तीन रानियाँ। तीनों अशिक्षित। राजा अपने कामों में इतने व्यस्त कि रानियों के लिए कोई समय नहीं। एक रानी टी.वी. की धारावाहिकों में मस्त रहती हैं। दूसरी साज-शृंगार और ख़रीद-फ़रोख़्त में व्यस्त। तीसरी शिक्षा ग्रहण करने में रम गईं। कुछ ही समय बाद राजा गए जेल। उन्हें तीन पत्नी रखने और शोषित करने की सज़ा मिली। क्योंकि तीसरी रानी ने राजा के विरूद्ध कर दिया था केस।
3.
एक राजा की तीन रानियाँ। एक चलाती थी घर और पालती थी राजकुमारों को। दूसरी थी दफ़्तर की सहकर्मी, लेती थी कामुक बातों में रस। तीसरी पड़ोसी की बेटी थी जो रेस्टोरेंट, सिनेमा या पार्क आदि में राजा के साथ होती थी मशगूल। एक दिन सड़क हादसों में राजा की हो गई मृत्यु। पहली रानी हो गईं दुखीहारी विधवा। दूसरी रानी देने लगी अपने दूसरे राजा को ज़्यादा समय। तीसरी तलाशने लगी एक रईस, उम्मीद भी है शीघ्र पा लेने की।

Sunday, November 13, 2011

भूलना

मैं भूल सकता हूँ
तुम्हारे कपड़ों का रंग
जिसे तुमने उस दिन पहना था
मैं वह दिन भी भूल सकता हूँ
जब तुम मुझे पहली बार मिली थी
तुमने क्या कहा था...क्या किया था
और मुझे कैसा लगा था
भूल सकता हूँ मैं

भूल सकता हूँ
तुम्हारे सहेलियों के नाम
तुम्हारे रिश्तेदारों का अता-पता
तुम्हारा पसंद-नापसंद व
सुख और दुःख का अतीत भी
शायद भूल सकता हूँ मैं
बावजूद इन सबके
याद रखना यह सच
मैं
'दुष्यंत' नहीं हूँ
दुष्यंत नहीं हूँ मैं...!

Friday, April 8, 2011

कलम में भरी है स्याही

कलम में भरी है स्याही
पर निब में नहीं आती
झटकना पड़ता था कई बार पहले
अब तो उसका भी असर नहीं
लगता है कुछ ज्यादा ही खफ़ा है मुझसे
उसके इस रवैये से दुखी बहुत हूँ
पर गुस्सा नहीं करता मैं
कुछ देर के लिए रख देता हूँ
कुछ देर बाद उठा के पता लगाता हूँ
करता हूँ प्रयास
कि हो जाये ठीक
हो भी जाती है पर ये बताकर
कि गलती मेरी थी
फिर आगे बढ़ने लगता है
हमारा प्रेम अनवरत....!

Monday, December 6, 2010

सौंदर्यशास्त्र

कुछ चेहरों को सामने से नहीं
बगल से देखो
कुछ के नज़दीक मत जाओ
उन्हें दूर से देखो
कुछ चेहरों को देखो सिर्फ़
'डिजीटल डिवाइसेज़'(अंकीय उपकरणों) में
वह ज़्यादा सुंदर लगेगा
सौंदर्य भी बदल लेता है
अपनी उपस्थिति का अंदाज़
प्रदर्शन की भंगिमा
या
उसे मजबूर कर दिया जाता है
ऐसा होने को
'वर्चुअल रिअलिटी' (अवास्तविक यथार्थ) द्वारा !!!

Sunday, August 29, 2010

संगति और संगीत

हमारी संगति में
संगीत बना रहे।

चुनमुन चिड़ैये का
वह छोटा सा घोंसला
कितना अच्छा हो कि
सजा रहे
पेड़ सुखने के बाद भी
और भला
पेड़ भी सूखे क्यों?
जब हम उसे पानी से नहीं
अमृत से सींचते हैं
अमृत वह विश्वास है
जिसे हमने हासिल किया है
रोज़मर्रा के सुख दुख में
इस तरह की ज़रूरत नहीं पड़ती कभी
“सॉरी” या “थैंक्स” के
बनावटी मकड़जाल की।

तुम मेरी नज़र में
उस पेड़ की तरह हो
जिसके पत्तों में खूब हरापन है
जिसके फूलों में रंगत है खूशबू है
और फल की संभावना भी
जिसने कस के जकड़ लिया है
उस ज़मीन को
जिसमें उसकी जड़ें फैली है
और सबसे बढ़कर
जिसके पास एक मुकम्मल
मजबूत तना है
जो उसका अपना है।