
चाँद सितारों की दुनियाँ
बागों बहारों की दुनियाँ
पहाड़ों नज़ारों की दुनियाँ
अच्छे लगते हैं मुझे,
तुम भी अच्छी हो.
अपनी माँ के सामने
भूख से रोता
उल्टी हथेली और कलाई से
नाक और आँख से बहते पानी पोछता
बच्चा,
कठोर धरती का कलेजा फाड़
भुरभुरी बनाता बढ़ता
हल का वह नुकीला
फाल,
गर्म लाल ज़िद्दी लोहे पर
वेग से गिरता
हथौड़ा..........इत्यादि,
और अच्छे लगते हैं ये.
तुम भी बहुत अच्छी हो.जानता हूँ
इतना नहीं है पर्याप्त,
पर मैं हूँ दुविधा में__
कैसे कहूँ खुश रहो हमेशाआज जब
जबकि मैं जानता हूँ
आज खुश होना
एक घटना है.
कैसे कहूँ सलामत रहो,
जबकि
हर शख्स तुम्हारे सिर को
अपनी मंजिल के लिए
सीढ़ी बनाना चाहता है.
कैसे कहूँ कि
ईश्वर करेगा तुम्हारा कल्याण
जबकि जानता हूँ
नहीं है कोई भी ईश्वर
जो
सोचे तुम्हारा भला.
सारी शुभकामनायें
प्रतीत हो रही है निरर्थक सी
कैसे कहूँ..........!
3 comments:
bhut hi aachi rachana. aap aapna word verification hata le taki hamko tipani dene mei aasani ho.
भास्कर जी! मेरी शुभकामनाएँ। आपकी रचनाएँ बहुत अच्छी लगीं। आना लगा रहेगा।
आपने अपने मन की बात को जिस सादगी से बयाँ किया है, उसकी जितनी तारीफ की जाए, कम है। बधाई।
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