Friday, May 30, 2008

क्रम या क्रमभंग








आज स्वीकारा उसने
अपना प्रेम...
इस तरह खुल गए
कुछ और नये मोर्चे
मेरी लड़ाइयों के.
मेरा हृदय फिर से
तैयार होने लगा
नये आघातों के लिए.
मेरी नयी खुशियों को मिला
परिचित-सा वही
पुराना खौफ़...
अब मैं फिर घिरूँगा
फिर भिरूँगा
जर्जर समाज की
मृत कुलबुलाहटों से
जाति, धर्म और रक्त संबंधों के
द्दढ शिकंजों से
अब मैं लिख पाऊँगा
कुछ नयी कवितायें
कुछ नये गीत
लेकिन
हो तो कुछ ऐसा
अब फिर न हो
मेरी हार
फिर न रह जाऊँ
मैं अकेला,
अपने से बेज़ार!

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