Thursday, August 28, 2008

तुम्हारे लिए








तुम फक़त तुम हो जो
सकती है बरस
रौशनी बनकर कहर सी
तक़दीर पर उन अंधेरों के
जिसने मुझे स्याह किया.

मैं तो हमेशा से
रहा हूँ बेज़ार
हर किस्म के अंधेरों से
चाहता था रौशनी मैं भी
पर जाने क्यों
रही नहीं ख्वाहिश अब
रौशनी की मुझे.

Tuesday, August 26, 2008

देखी अनदेखी


“चुप हो मुन्ना
न रो मुन्ना….”
कहा-
उसके थपथपाते हाथों ने
मूक बहते हुए आंसूओं ने
घुटकर.
फटे चीथड़ों में
अपने निरर्थक बालपन को कुचल
उस पर बैठी,
अचानक व्यस्क हुई यह बच्ची
गोद में
भूख से तड़पते छोटे भाई को
सम्भालती
जैसे
देश के भूखे भविष्य को
अपनी बेबसी में
पुचकारती
तसल्ली-सी दे रही हो

जाने कब तक रोयेंगे
ये दोनों.....!

Monday, August 11, 2008

रात की अकल्पित पर.....


सूखी ही सही
दो रोटी और दो चुल्लू पानी के लिए
ये दोनों
भिगोये जाते हैं पसीने में
दिन भर,
और कठिनतम परिश्रमों में
गूंथकर
तपाये जाते हैं
तुच्छ स्वार्थियों की लोलुपता में.

रात की गहरी खमोशी
इनका बच्चा रोता है
पहले धीरे
फिर जोर से
फिर वह चिल्लाता है
जोर-जोर से,
लेकिन कुछ ही देर में
आवाज़ बन जाती है
घुटन
और वह सो जाता है
अंदर ही अंदर
घुटते-घुटते.
ये दोनों हैं सो रहे
अभी-भी
मौत की-सी नींद में.

सुबह उन्हें हैं फिर जन्म लेना
रात की अकल्पित पर
निर्णीत मौत के लिए!

Saturday, August 2, 2008

झुग्गी निवासी का हृदयोद्गार


परेशान सहमी नज़रों से
बादल को घिरते देखा है

जिनके होने में जीवन है
जीवन की गति भी जिनमें है
उन संजोये सामानों को
घड़ी घड़ी गलते देखा है
बादल को घिरते देखा है

दरवाजों के झटके से
हिलते दीवारों के दु:ख पर
छप्पर को रोते देखा है
बादल को घिरते देखा है

अपने श्रम से जीने वाली
गृहणी के गीले आंचल में
बालक को डरते देखा है
बादल को घिरते देखा है

केवल भावजगत से मिले उधार
अपने जीवन की खुशियों को
हर एक पल मरते देखा है
बादल को घिरते देखा है.