Thursday, June 26, 2008

हे मेरे वे


आज मैं बिल्कुल दु:खी नहीं हूँ
क्योंकि मैं अपने आप को समझा सकता हूँ
मना सकता हूँ
मेरे पास सौ से अधिक ऐसे तर्क हैं
जो सिद्ध कर सकते हैं
कि मुझे
दु:खी होने का कोई अधिकार ही नहीं है.
कोई चाहे कुछ भी कह दे
कोई चाहे कुछ भी कर ले
गलती सदैव मेरी ही होती है,
क्योंकि मुझे मानना पड़ता है
क्योंकि मेरे पास चारा नहीं है
क्योंकि मैं वैसा नहीं हूँ जैसे लोग हैं
क्योंकि लोग बहुत अच्छे हैं
क्योंकि वे जीना जानते हैं
जीने के लिए तिकड़म जानते हैं
और सबसे पहले
वे जीने का मक़सद जानते हैं,
क्योंकि वे खुद को जानते हैं
क्योंकि खुद के लिए दुनिया की जरूरत जानते हैं
और इसी आधार पर
दुनिया से खुद का रिश्ता बनाते हैं.
जिनसे उनकी खुदी बुलंद नहीं होती
वो उनके सामने ऐसे रहते हैं
जैसे अंधेरा
क्योंकि वो एक उलझन है
एक परेशानी है
एक समस्या है
कुल मिलाकर एक सिरदर्द है
जिनसे दामन बचा ही रहे तो बेहतर है.

मैं दु:खी नहीं हूँ
क्योंकि किसी को दु:खी करना
सामान्यत: मेरी फ़ितरत नहीं है,
क्योंकि मैं जानता हूँ प्यार करना
क्योंकि मैं प्यार महसूस कर सकता हूँ
फिर भी यह सोचना
कि कभी कोई
मेरे दु:ख से दु:खी होगा
बहुत बड़ा छलावा है.
उन्हें दु:ख नहीं होगा
क्योंकि उन्हें दु:ख से चिढ़ है
क्योंकि वे दु:ख से बौखलाते हैं
क्योंकि उन्हें दु:ख का एहसास नहीं है
क्योंकि उन्हें नहीं मालूम प्यार क्या है
क्योंकि उन्हें प्यार महसूस करने से परहेज है
क्योंकि वे बड़े लोग हैं
मैं छोटा!
नहीं जानता जीना
या शायद
हम जैसे लोग ही
सही मायनों में
जीवित हैं.

3 comments:

महेन said...

हे हतभाग्य! क्यों है उदास? यहाँ कुछ कहने का मन हो रहा है। ऐसा जोकि उनके लिये भी शायद सच हो आपके
"…हम जैसे लोग ही
सही मायनों में
जीवित हैं"
के दायरे में नहीं आते।

"हम मरते नहीं
क्योंकि जीना
जीते चले जाना
मरकर भी
हमारी आदतों में शुमार है।"

कविता तो खैर बाकी कविताओं की तरह अच्छी है ही। आपसे अधिक अच्छेपन की आशा है। ;)
शुभम।

advocate rashmi saurana said...

bhut aachi rachana.likhate rhe.

सुजाता said...

सुरुचिपूर्ण साजसज्जा वाला ब्लॉग । आपकी कलात्मकता का परिचय इस जगह में मिलता है ।
बढिया !
सुजाता
sandoftheeye.blogspot.com
bakalamkhud.blogspot.com