Monday, September 1, 2008

एक मेरा साथ


तेजी से चढते-उतरते
तुम्हारी धड़कनों और सांसों के
बीच कहीं
फँसा हूँ मैं…
तुम्हारी बेचैनियों और घबराहटों में भी
कहीं
धँसा हूँ मैं…
मैं हूँ कि
गिराता जा रहा हूँ
तुम्हारी शाख के
हरे भरे पत्तों को भी
नयी कोंपलें और नये फूल
खिलाने की कोशिश में…
चाहता हूँ कि बनूँ
तुम्हारी कामयाबियों का पैग़ाम
एक ऐसी सीढ़ी
कि जिस पर चढ़
दुनिया की हर ऊँचाई तुम्हें
नीची लगे.
पर अक्सर जाने क्यों
तुम्हारे सामने
मेरी जुबाँ गुनहगार हो जाती है
और सिर
लज्जित…………!

1 comment:

परमजीत बाली said...

सुन्दर रचना है।बधाई।