Wednesday, October 14, 2009

मार डालो मुझे!








आओ और आकर
मार डालो मुझे!
इस महान् देश में जीकर
कोई क्या करे
जहाँ महान् होने के लिए
जरूरी होता जा रहा है
धनवान होना,
और धनवान होने के लिए
चोर, डाकू, लूटेरा
साथ ही
दोगला, अवसरवादी और नाशवान होना...

जहाँ किसी पर विश्वास करने के लिए
और किसी के लिए विश्वसनीय होने की
एक मात्र कसौटी
सार्थकता नहीं
स्वार्थता हो गई हो...

जहाँ जाता हो खरीदा
यौवन और सौंदर्य
नग्नता के डिस्काउन्ट पर...

जहाँ ईमानदारी अभिशाप है और
वक्त आने पर गधा भी हो जाता बाप है...

जहाँ हर पल रखा जा रहा है गिरवी
इस तरह हमारी आज़ादी
कि हम हो जाते हैं मज़बूर
खरीदने के लिए अपनी गुलामी
अपने ही हाथों से...

जहाँ जिसके पास बहुत बड़ी कार है
वही सरकार है
प्रशासन और पुलिस जिसका मुख्तार है...

जहाँ रोटी के लिए भूखों का संघर्ष
अवैधानिक है, अश्लील है, आतंक है...

खुद ही बताओ
क्या करें!

Friday, September 11, 2009

भवितव्य अतीत



याद आता है
अक्सर..
तेज बारिश के झोंको में
उम्मीद से छोटी
और
औक़ात से मामूली
छतरी के नीचे
उसे मजबूती से थामे
हमारा
भींगना......भींगते जाना
एक दूसरे की आँखों में
लगभग अपलक देखते हुए।

गुज़रे हुए सुखद क्षणों को
एक स्थिति
की तरह नहीं
मैं इसे
प्रतीक
की तरह
याद करना चाहता हूँ
ताकि दिख सके
हमारे भावी आदर्श जीवन की
सम्भावनाशील परिकल्पना....!

Thursday, September 3, 2009

तुम अमूल्य हो


जिसे ढूँढता रहा
सागर की गहराइयों में,
पर्वतों की गुफाओं में,
ग्रहों में, नक्षत्रों में,
और न जाने कहाँ-कहाँ.
उसे देखता हूँ मैं
तुम्हारे आँखों में सजे
निश्छल सौन्दर्य के
अविकल भावों में.
जिसमें बसा है वह
जो मिलता है,
जुते ज़मीन पर गिरे
चार बूँद पानी में,
नवजात बच्चों के
मस्तभरी छलाँगों में,
धड़कनों और
ज़ुबानों को रोककर,
छलकनें को उतावले
आँसूओं में...
* तुम अमूल्य हो *

Sunday, June 28, 2009

वक्त बेवक्त


सूखी ही सही
दो रोटी और दो चुल्लू पानी के लिए
ये दोनों
भिगोये जाते हैं पसीने में
दिन भर,
और कठिनतम परिश्रमों में
गूंथकर
तपाये जाते हैं
तुच्छ स्वार्थियों की लोलुपता में.

रात की गहरी खमोशी
इनका बच्चा रोता है
पहले धीरे
फिर जोर से
फिर वह चिल्लाता है
जोर-जोर से,
लेकिन कुछ ही देर में
आवाज़ बन जाती है
घुटन
और वह सो जाता है
अंदर ही अंदर
घुटते-घुटते.
ये दोनों हैं सो रहे
अभी-भी
मौत की-सी नींद में.

सुबह उन्हें हैं फिर जन्म लेना
रात की अकल्पित पर
निर्णीत मौत के लिए!

Wednesday, June 24, 2009

अह्म (मैं) भाव का अतिरेक


(आज की देखी एक घटना पर आधारित)

"बिहारी" को
गालीवाचक शब्दों में प्रयोग करनेवाले नागरिकों पर
इस सत्य और तथ्य का
काई असर नहीं पड़ता
कि
वह कितना कर्मठ है
कितना ज्ञानी और विद्वान
मुफ़लस व्यवस्था के इन निवासियों में
कैसी है
आचरण की सभ्यता
व्यवहारिक मूल्यों की मानवता।
दरअसल
अह्म (मैं) भाव का अतिरेक
एक ऐसा हिटलर है
जिसमें प्रेम और
साहचर्य संबंध के लिए
कोई स्थान नहीं।

Sunday, June 14, 2009

आज आम आदमी की पहचान










दिन दूनी रात चौगुनी

तरक्की की लालसा में

आम आदमी

भीड़ में बिगड़ती, खोती पहचान

बचाने बनाने की लालसा में

आम आदमी

जीवन में हर घड़ी

सूअर की तरह मरता है

साथियों के अभाव में।

आम आदमी में

ज्ञान का अभाव नहीं

मूल्य भी अपार है

लेकिन इसका नपुंसक हो जाना ही

आज आम आदमी की पहचान है।

Saturday, June 13, 2009

कुछ यूं ही दिख रहे हैं


परिस्थितिजन्य मजबूरियों में व्यस्त
कुछ आकुल
कुछ व्याकुल
कुछ में झुंझलाहट बहुत है जो
डर से परे नहीं,
चेहरे से है नदारत
कृत्रिम श्रृंगार की चमक,
आज प्राकृतिक दमक ने
उन्हें आम बना दिया है,
आज उनकी पहचान है
भाषिक अभिव्यक्ति मूलक भ्रम में नहीं
बल्कि
हस्तलिपि के सौन्दर्य में।
कुछ यूं ही दिख रहे हैं
महाविद्यालय के परीक्षा भवन में बैठे
परीक्षार्थी।

Friday, May 8, 2009

इस तरह के “वे”


वे पढ़ाते हैं
और पढ़ाने की कमाई खाते हैं
लेकिन नहीं चाहते पढ़ाना
पढ़ना तो बिल्कुल नहीं चाहते
कमाई चाहते हैं
कमाने का यह माध्यम तो
बहुत ज्यादा पसंद है।

उन्हें कुछ साधनों से बहुत लगाव है
लक्ज़री होने तक
लेकिन
साधना से हिकारत है
उसके तो इर्द गिर्द भी नहीं होते।
इस तरह के “वे” भले सब नहीं
पर
न जाने कितने हैं….!

Thursday, April 30, 2009

मिथ्या आस्थाओं का सहारा


जीवन को पारिभाषित करने की असंख्य कोशिशों का
जो भी परिणाम हो
मैं जीवन के कसरत की चारदीवारी में कैद
अपने विवशता की गिड़गिड़ाहट को
पशु होने से बचाने के प्रयत्न में
नश्वर जगत के
मिथ्या आस्थाओं का सहारा लेता हूँ।

मैं संबंधों के कशमकश में
भावनाओं की भूमिका को
इन सहारों के सहारे
तिरस्कृत करता हूँ।

मैं गति, परिवर्तन और विकास की
द्वन्द्वात्मक वैचारिक संकल्पना को
इन्हीं सहारों के दम पर दरकिनार कर
इतराने के छद्म का
प्रदर्शन करता हूँ।
मैं "मैं" हूँ
एकमात्र "मैं"...!

Monday, April 27, 2009

आज की राजनीति पर

आज की राजनीति पर
मन नहीं कर रहा कुछ कहने का
मन नहीं कर रहा कुछ लिखने का
मन नहीं कर रहा कुछ सोचने का
अब तो
कुछ सुनने से भी बचता हूँ
कुछ देखने से भी बचता हूँ
कुछ करना तो बहुत दूर की बात है
अर्थात्
मैं नागरिक कर्तव्य की अवहेलना कर रहा हूँ
यानी
मैं भी "राजनीति" कर रहा हूँ।

Saturday, April 18, 2009

नींद मेरी जीवन कथा में


नींद मेरी जीवन कथा में
एक ऐसी नायिका की तरह है
जो विवाह से पूर्व प्रेयसी की
भाव-भंगिमाओं में जगाती रही
विवाहोपरांत स्त्री की
अहं-भावी भृकुटि से
प्रतिशोध के परिणाम के तहत
सोने नहीं देती है।
मैं अपने कलम के साथ
उसी के सहारे गुफ्तगू कर रहा हूँ
रात के चार बजे
पर नींद नायिका का
अपनी कामयाबी में मस्त
सुनहरे ख्वाबों में कहीं सो रही है।

Friday, March 13, 2009

राधे-कृष्ण (लघुकथा)

पिता घर के कोने में बैठे सन्न थे. माता रो रही थी. भाई ने बहन को झन्नाटेदार थप्पर लगाया. सबको आज ही जानकारी मिली थी कि वह किसी लड़के से प्रेम करती है. बहन गुस्से में काँपती हुई भाई को गालियाँ सुनाए जा रही थी, उस भाई को जो बड़ा है और जिसने अब तक मोबाइल की फ़र्माइश पूरी नहीं की, फिर भी आज इतनी हिम्मत! अचानक घर से निकलने लगी यह कहकर कि अब वह इस घर में नहीं रहेगी. पकड़ लिया भाई ने, फिर लगाए थप्पड़. माता का रूदन बढ़ गया. बहन भी चिल्लाने लगी रोते हुए. पिता डरने लगे कहीं आत्महत्या न कर ले बेटी! …
धीरे-धीरे घर में छा गया सन्नाटा. कल जन्माष्टमी है. राधे-कृष्ण, राधे-कृष्ण !

फेरे सात (लघुकथा)

कभी बड़े उमंग और उल्लास में पूरे हुए थे फेरे सात. पर आज वह पास तो है लेकिन साथ नहीं. पास भी इसलिए है क्योंकि पास रहने को विवश किया है वस्तुओं ने, पदार्थों ने, सौन्दर्य प्रसाधनों ने, विलासिता के उपकरणों ने. और इन्हीं चीजों ने ही शायद उसके साथ नहीं रहने दिया. इन्हीं से उत्पन्न "मैं" से कल ऐसा भी होगा कि पास भी रहने नहीं देगा. इसके बावजूद जाने क्यों मैं भी कष्टों से परे सजीव रह रहा हूँ और सजीव ही रहूँगा. जाने क्यों?