
तुम फक़त तुम हो जो
सकती है बरस
रौशनी बनकर कहर सी
तक़दीर पर उन अंधेरों के
जिसने मुझे स्याह किया.
मैं तो हमेशा से
रहा हूँ बेज़ार
हर किस्म के अंधेरों से
चाहता था रौशनी मैं भी
पर जाने क्यों
रही नहीं ख्वाहिश अब
रौशनी की मुझे.
नज़दीकियों में रंजिश है
दूरी तो कतई बर्दाश्त नहीं
ऐसा क्यों कर मुमकिन हो
कि पास रहें पर साथ नहीं.
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दर्द
ये तुझसे कैसा रिश्ता है मेरा
लौट ही आता हूँ मैं
घड़ी दो घड़ी के बाद.
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लुटा लुटा सा जीता हूँ
हर लम्हा ज़िन्दगी का
तुम मेरी जागीर हो
क्या करूँ तुम्हारा मैं.
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