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नज़दीकियों में रंजिश है
दूरी तो कतई बर्दाश्त नहीं
ऐसा क्यों कर मुमकिन हो
कि पास रहें पर साथ नहीं.
* * * * * * *
दर्द
ये तुझसे कैसा रिश्ता है मेरा
लौट ही आता हूँ मैं
घड़ी दो घड़ी के बाद.
* * * * * *
लुटा लुटा सा जीता हूँ
हर लम्हा ज़िन्दगी का
तुम मेरी जागीर हो
क्या करूँ तुम्हारा मैं.
* * * * * *
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