
जीवन को पारिभाषित करने की असंख्य कोशिशों का
जो भी परिणाम हो
मैं जीवन के कसरत की चारदीवारी में कैद
अपने विवशता की गिड़गिड़ाहट को
पशु होने से बचाने के प्रयत्न में
नश्वर जगत के
मिथ्या आस्थाओं का सहारा लेता हूँ।
मैं संबंधों के कशमकश में
भावनाओं की भूमिका को
इन सहारों के सहारे
तिरस्कृत करता हूँ।
मैं गति, परिवर्तन और विकास की
द्वन्द्वात्मक वैचारिक संकल्पना को
इन्हीं सहारों के दम पर दरकिनार कर
इतराने के छद्म का
प्रदर्शन करता हूँ।
मैं "मैं" हूँ
एकमात्र "मैं"...!